रिपोर्ट - बबलू वेद, झाड़ोल
झाड़ोल। वन विभाग झाड़ोल में सात वनरक्षकों की बीट, नाके और चार्ज बदलने का मामला अब महज ड्यूटी व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि विभागीय नियमों, उच्चाधिकारियों के आदेशों और प्रशासनिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। क्षेत्रीय वन अधिकारी कार्यालय झाड़ोल की ओर से 24 अगस्त को सात वनरक्षकों की कार्यव्यवस्था में बदलाव के आदेश जारी किए गए। खास बात यह है कि यह कार्रवाई ऐसे समय में की गई, जब विभाग में तबादलों पर रोक लागू है और प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख (हॉफ) के पूर्व आदेश में अधीनस्थ कार्यालयों को अपने स्तर पर कर्मचारियों का स्थानांतरण, पदस्थापन, प्रतिनियुक्ति अथवा कार्यव्यवस्था बदलने से रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
हॉफ के आदेश के बावजूद आखिर किसके आदेश पर बदली कार्यव्यवस्था? यही सवाल अब झाड़ोल वन विभाग से लेकर वन मंडल कार्यालय तक चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 26 जून 2024 को जारी हॉफ के आदेश में स्पष्ट किया गया था कि अधीनस्थ कार्यालय अपने स्तर पर ऐसी कार्रवाई नहीं कर सकते तथा अत्यंत आवश्यक परिस्थिति में भी मुख्यालय से अनुमति अथवा अनुमोदन लिया जाना आवश्यक है। इसके बावजूद झाड़ोल रेंजर कार्यालय से सात वनरक्षकों के नाके, बीट और चार्ज बदलने के आदेश जारी होना विभागीय व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
मामले में सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सरकार की ओर से 10 जुलाई से तबादलों पर रोक लागू होने की स्थिति में कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र में इस तरह का व्यापक बदलाव किया गया। भले ही इसे स्थानांतरण के बजाय ‘कार्यव्यवस्था’ का नाम दिया गया हो, लेकिन जब किसी वनरक्षक का नाका, बीट और चार्ज ही बदल दिया जाए तो यह जांच का विषय बन जाता है कि ऐसी कार्यव्यवस्था के लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति थी या नहीं।
जारी आदेश के अनुसार अंबालाल वड़ेरा को लालाराम मीणा वनरक्षक से चार्ज लेकर पालियाखेड़ा नाके की बीट सौंपी गई। राकेश कुमार गदात को मनोहर लाल गोराणा से चार्ज लेकर गोराणा नाके की बीट दी गई। यशवंत प्रजापत को नरेन्द्र सिंह झाला सहायक वनपाल से चार्ज लेकर नैनबारा नाके की बीट सौंपी गई। रवि कुमार मीणा को बीट टिंडोर में लगाया गया। योगेश मेघवाल को मगवास नाके के कीरट घाटा एवं मोहम्मद फलासिया वनखंड की जिम्मेदारी दी गई। सुरेश कुमार मीणा को दमाणा, पेरेड़ा पर्वत एवं ढीमड़ी की पश्चिमी ढाल का कार्यक्षेत्र सौंपा गया, जबकि मनोहर लाल गोराणा को गोराणा नाके की बीट, कोटमाल और नारायणी की जिम्मेदारी दी गई।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हॉफ के आदेश में अधीनस्थ कार्यालयों को बिना मुख्यालय की अनुमति कार्यव्यवस्था बदलने से रोक दिया गया था, तो झाड़ोल में सात वनरक्षकों की कार्यव्यवस्था बदलने का अधिकार रेंजर कार्यालय को किस आधार पर मिला? क्या इसके लिए मुख्यालय से लिखित अनुमति ली गई थी? यदि अनुमति नहीं ली गई तो आदेश जारी करने की जरूरत और अधिकार किस स्तर से तय हुआ? और यदि यह केवल कार्यव्यवस्था थी तो इसे बदलने से पहले सक्षम अधिकारी की स्वीकृति क्यों नहीं ली गई?
मामले को लेकर झाड़ोल रेंजर अभिषेक भटनागर का बयान भी पूरे प्रकरण को और गंभीर बना देता है। रेंजर ने स्वीकार किया कि हॉफ से अनुमति नहीं ली गई थी। उनका कहना है कि मामले की जानकारी डीएफओ को देकर अनुमति लेने की बात कही गई। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि अनुमति लेना आवश्यक था तो अनुमति मिलने से पहले ही कार्यव्यवस्था बदलने का आदेश कैसे जारी हो गया?
वहीं वन मंडल दक्षिण के डीएफओ विजयशंकर पांडे ने मामले की जांच कराने की बात कही है। अब जांच पर ही यह निर्भर करेगा कि झाड़ोल रेंजर कार्यालय द्वारा जारी आदेश विभागीय नियमों के अनुरूप था अथवा उच्चाधिकारियों के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी कर जारी किया गया।
नाके बदलने से उठे अधिकारों पर सवाल, अब जांच से खुलेगा पूरा राज
झाड़ोल वन विभाग में सात वनरक्षकों के नाके और बीट बदलने का मामला अब विभागीय गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। यह मामला केवल कर्मचारियों की ड्यूटी बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि किस अधिकारी को कितना प्रशासनिक अधिकार है और उच्चाधिकारियों के आदेशों की पालना किस स्तर तक अनिवार्य है, इस पर भी सवाल खड़े करता है।
यदि डीएफओ की जांच में यह सामने आता है कि कार्यव्यवस्था बदलने से पहले सक्षम स्तर से अनुमति नहीं ली गई थी, तो फिर यह भी तय होना बाकी है कि नियमों की अनदेखी की जिम्मेदारी किसकी होगी और क्या संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी? फिलहाल सात वनरक्षकों के नाके बदलने के आदेश ने झाड़ोल वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालों की ऐसी लकीर खींच दी है, जिसका जवाब अब जांच के बाद ही सामने आएगा।
