जब मुख्यमंत्री गांव की चौपाल में आम आदमी बन गए... कटोरी में चाय, आदिवासी परिवार के घर भोजन, बारिश में भी जनता के बीच डटे रहे — झाड़ोल के बीड़ा गांव से एक ऐसा अनुभव जिसने बदल दी मुख्यमंत्री भजनलाल शर्म
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— गजेन्द्र लौहार की कलम से

राजनीति में नेताओं को हम अक्सर बड़े मंचों, भाषणों और सुरक्षा घेरे के बीच देखते हैं। आम नागरिक के मन में भी उनकी एक तय छवि बन जाती है। मेरे मन में भी राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल जी शर्मा को लेकर कुछ ऐसी ही सामान्य राजनीतिक छवि थी। लेकिन झाड़ोल के बीड़ा गांव में आयोजित रात्रि चौपाल में उन्हें करीब से देखने और उनके काम करने के तरीके को समझने का अवसर मिला तो मेरी सोच पूरी तरह बदल गई।

यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि जनता और जनप्रतिनिधि के बीच विश्वास का जीवंत उदाहरण था।

रात्रि चौपाल में मुख्यमंत्री जी मंच तक सीमित नहीं रहे। वे बार-बार लोगों के बीच पहुंचे, माताओं-बहनों से सीधे संवाद किया, उनकी समस्याएं सुनीं, सुझाव लिए और हर मुद्दे को गंभीरता से समझने का प्रयास किया। उनके चेहरे पर औपचारिकता नहीं, बल्कि अपनापन दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था मानो मुख्यमंत्री जी नहीं, गांव का ही कोई जिम्मेदार सदस्य लोगों के बीच बैठे हो।

इस अनुभव का सबसे यादगार दृश्य अगले दिन सुबह देखने को मिला। मुख्यमंत्री जी ग्रामीणों के बीच पहुंचे, उनके साथ जमीन पर बैठकर गांव की स्थिति जानी और बिल्कुल सामान्य कटोरी में चाय पी। आज के समय में जहां छोटे-से-छोटे अतिथि के लिए भी विशेष व्यवस्था की जाती है, वहां प्रदेश के मुख्यमंत्री जी ग्रामीणों के साथ उसी सहजता से चाय पीते दिखाई दिये। यह केवल एक तस्वीर नहीं थी, बल्कि सादगी, संवेदनशीलता और जनसरोकार का संदेश थी।

यहीं नहीं, उन्होंने आदिवासी परिवार के घर भोजन कर उनकी संस्कृति और परंपराओं का सम्मान किया। गरासिया समाज के पारंपरिक वालर नृत्य के दौरान कलाकारों के साथ तालियां बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया। यह स्पष्ट था कि वे केवल कार्यक्रम की औपचारिकता निभाने नहीं आए थे, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति को महसूस करने और उसका सम्मान करने पहुंचे थे।

तेज बारिश के बावजूद चौपाल का उत्साह कम नहीं हुआ। मुख्यमंत्री जी भी बिना किसी जल्दबाजी के पूरे समय जनता के बीच डटे रहे। वे लगातार लोगों की बातें सुनते रहे और अधिकारियों को मौके पर ही आवश्यक निर्देश देते रहे।

राजनीति में अक्सर घोषणाएं सुनने को मिलती हैं, लेकिन बीड़ा की चौपाल में निर्णय भी होते दिखाई दिए। महिलाओं और ग्रामीणों की मांगों पर मुख्यमंत्री जी ने केवल आश्वासन नहीं दिया, बल्कि कुछ ही मिनटों में कई विकास कार्यों को स्वीकृति दिलाकर यह संदेश दिया कि यदि इच्छा शक्ति हो तो फैसले फाइलों में महीनों तक अटकते नहीं हैं।

झाड़ोल जैसे आदिवासी और पिछड़े क्षेत्र के लोगों के लिए यह चौपाल केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि विश्वास, उम्मीद और विकास का नया अध्याय था। लोगों के चेहरों पर यह भरोसा साफ दिखाई दे रहा था कि उनकी आवाज सीधे प्रदेश के मुखिया तक पहुंची और उसी समय उस पर कार्रवाई भी शुरू हुई।

एक पत्रकार के रूप में मैंने अनेक सरकारी कार्यक्रम देखे हैं, लेकिन बीड़ा गांव का यह अनुभव मेरे लिए अलग रहा। यहां सत्ता का प्रदर्शन कम और संवेदनशील नेतृत्व अधिक दिखाई दिया। जब प्रदेश के मुख्यमंत्री जी गांव की चौपाल में बैठकर लोगों की बातें सुनते है, उनकी संस्कृति का सम्मान करते है, उनके साथ भोजन करते है, कटोरी में चाय पीते है और मौके पर ही निर्णय लेकर राहत देने का प्रयास करते है, तब लोकतंत्र केवल किताबों का शब्द नहीं रहता, बल्कि जमीन पर जीवंत दिखाई देता है।

बीड़ा की इस चौपाल से लौटते समय मेरे मन में मुख्यमंत्री जी की जो नई छवि बनी, वह केवल एक राजनेता की नहीं, बल्कि ऐसे जननेता की थी जो जनता के बीच जाकर उन्हें सुनने और उनकी समस्याओं का समाधान करने में विश्वास रखते है। शायद यही किसी भी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पहचान होती है।

— गजेन्द्र लौहार :::