तीन माताएं, चार बेटे और एक परिवार… भरत के त्याग ने दुनिया को सिखाई भाईचारे की असली परिभाषा
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एनपी न्यूज 24/ गजेन्द्र लोहार, डेस्क

 कैकेयी के दो वरदानों ने अयोध्या का राजमहल बदल दिया, लेकिन भरत के चरित्र ने भाइयों की एकता को टूटने नहीं दिया। आज जब संपत्ति के लिए भाई-भाई से दूर हो रहे हैं, तब राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जीवन हर परिवार के लिए एक बड़ी सीख है।

अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्र थे—राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। चारों की माताएं तीन थीं। श्रीराम माता कौशल्या के पुत्र थे, भरत माता कैकेयी के और लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न माता सुमित्रा के पुत्र थे। लेकिन चारों भाइयों के बीच कभी मां के आधार पर भेदभाव नहीं हुआ। उनका रिश्ता केवल खून का नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और समर्पण का था।

समय ने ऐसा मोड़ लिया कि माता कैकेयी ने पुत्र मोह में राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए। पहला—भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए और दूसरा—श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए।

एक पल में अयोध्या की खुशियां बदल गईं। जिस राजमहल में श्रीराम के राजतिलक की तैयारियां हो रही थीं, उसी महल से उन्हें चौदह वर्ष के वनवास के लिए विदा होना पड़ा। श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा रखते हुए बिना विरोध वनवास स्वीकार कर लिया। लक्ष्मण भी राजमहल के सुख छोड़कर उनके साथ वन चले गए।

लेकिन इस पूरी घटना में सबसे बड़ा उदाहरण भरत ने प्रस्तुत किया।

जब भरत को माता कैकेयी के वरदानों और श्रीराम के वनवास का पता चला, तो उन्होंने राजगद्दी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनके लिए राजा बनना खुशी की बात नहीं थी, बल्कि बड़े भाई के साथ हुए अन्याय का विषय था। वे श्रीराम को वापस अयोध्या लाने के लिए वन पहुंचे। उन्होंने बड़े भाई से लौटकर राज्य संभालने का आग्रह किया, लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन को सर्वोपरि रखा।

तब भरत ने श्रीराम की चरण पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटने का निर्णय किया। उन्होंने उन पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित किया और स्वयं को राजा नहीं, बल्कि श्रीराम का प्रतिनिधि मानकर राज्य का संचालन किया। चौदह वर्षों तक उन्होंने बड़े भाई के लौटने की प्रतीक्षा की।

जरा सोचिए, जिस राज्य का सिंहासन भरत को मिल रहा था, उसे उन्होंने अपने बड़े भाई के अधिकार के सामने महत्वहीन मान लिया। वे चाहते तो राजसुख भोग सकते थे, लेकिन उन्होंने भाई के सम्मान और अधिकार को अपना स्वार्थ नहीं बनने दिया।

लक्ष्मण ने वनवास में श्रीराम का साथ निभाया और भरत ने अयोध्या में उनके लौटने तक उनके अधिकार की रक्षा की। शत्रुघ्न ने भी भरत के साथ रहकर परिवार और राज्य के दायित्वों में सहयोग दिया। चारों भाइयों के रास्ते और परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन परिवार के प्रति उनका प्रेम एक था।

यही राम परिवार की सबसे बड़ी विशेषता थी—तीन माताएं होने के बावजूद चारों भाइयों के बीच कभी मां के आधार पर दूरी नहीं आई। किसी ने दूसरे के हिस्से पर अधिकार जमाने की कोशिश नहीं की। किसी ने भाई की परेशानी को अपनी सुविधा से छोटा नहीं समझा। उनके लिए परिवार का सम्मान व्यक्तिगत स्वार्थ से बड़ा था।

आज के परिवारों को इस प्रसंग से सीखने की जरूरत है

आज कई घरों में जमीन के एक टुकड़े, मकान के एक कमरे, दुकान के हिस्से, पैसों और संपत्ति के बंटवारे को लेकर भाई-भाई के बीच दूरियां पैदा हो जाती हैं। जिस आंगन में बचपन साथ बीता, उसी आंगन में दीवारें खड़ी हो जाती हैं। माता-पिता के सामने साथ बैठने वाले भाई कई बार वर्षों तक एक-दूसरे से बात नहीं करते।

कभी छोटे भाई को लगता है कि बड़े भाई ने उसका हक ले लिया, तो कभी बड़े भाई को शिकायत होती है कि छोटा भाई जिम्मेदारियां नहीं निभाता। कई बार परिवार के लोग आपसी बातचीत और समझदारी से विवाद सुलझाने के बजाय अहंकार को आगे रख देते हैं।

लेकिन एक बार भरत के चरित्र को याद कीजिए। उन्हें पूरा राज्य मिल रहा था, फिर भी उन्होंने भाई का अधिकार नहीं छीना। आज हमारे सामने सवाल है—क्या हम अपने भाई के साथ थोड़ा-सा प्रेम और सम्मान नहीं रख सकते? क्या संपत्ति इतनी बड़ी हो गई है कि बचपन के रिश्ते भी उसके सामने छोटे पड़ गए?

घर का बंटवारा हो सकता है, जमीन का बंटवारा हो सकता है, लेकिन दिलों का बंटवारा नहीं होना चाहिए। विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मन में एक-दूसरे के प्रति द्वेष रखना परिवार को कमजोर करता है। भाई की तरक्की देखकर खुश होना, जरूरत के समय उसके साथ खड़ा होना और माता-पिता की जिम्मेदारी मिलकर निभाना ही सच्चे भाईचारे की पहचान है।

इस दीपावली भाइयों के नाम एक संदेश

दीपावली पर जब हम अपने घरों में दीपक जलाएं, तो एक दीप अपने परिवार की एकता के नाम भी जलाएं। यदि किसी भाई से नाराजगी है तो बातचीत की शुरुआत करें। यदि कोई पुराना विवाद है तो उसे समझदारी से सुलझाने का प्रयास करें। माता-पिता के जीवनकाल में ही परिवार को एकजुट रखने का संकल्प लें।

याद रखिए, माता-पिता के लिए सबसे बड़ी खुशी यह नहीं होती कि उनके बच्चों के पास कितनी संपत्ति है, बल्कि यह होती है कि उनके बच्चे एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े हैं।

भगवान श्रीराम ने मर्यादा सिखाई, लक्ष्मण ने साथ निभाना सिखाया, भरत ने त्याग और अधिकार का सम्मान करना सिखाया तथा शत्रुघ्न ने सहयोग और समर्पण का उदाहरण दिया।

जिस परिवार में राम जैसी मर्यादा, लक्ष्मण जैसा साथ, भरत जैसा त्याग और शत्रुघ्न जैसा सहयोग हो, उस परिवार को कोई परिस्थिति कमजोर नहीं कर सकती। अयोध्या की असली सुंदरता उसके महलों में नहीं, बल्कि चारों भाइयों के प्रेम में थी। यही प्रेम हर घर की पहचान बने, यही इस दीपावली का सबसे बड़ा संदेश है। इस बार दीप केवल घरों में नहीं, रिश्तों में भी जलाएं। क्योंकि परिवार साथ है तो खुशियां हैं, परिवार एक है तो हर मुश्किल आसान है।

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। — गजेन्द्र लोहार