दिवाली कि पुर्व संध्या पर खास रिपोर्ट - गजेन्द्र लोहार
दिवाली की पूर्व संध्या पर याद करें भगवान श्रीराम का त्याग, धैर्य, आदर्श और मर्यादा का वह प्रसंग, जो आज भी जीवन जीने की राह दिखाता है।
कभी-कभी इतिहास के कुछ प्रसंग केवल पढ़े नहीं जाते, उन्हें महसूस किया जाता है। कुछ कहानियां केवल बीते समय की घटनाएं नहीं होतीं, बल्कि पीढ़ियों को जीवन जीने का तरीका सिखाती हैं। भगवान श्रीराम का चौदह वर्ष का वनवास और अयोध्या वापसी भी ऐसा ही एक प्रसंग है, जिसमें त्याग है, धैर्य है, परिवार के प्रति सम्मान है, वचन की मर्यादा है और अपार प्रेम है।
कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब अयोध्या के राजमहल में राजतिलक की तैयारियां चल रही थीं। पूरी नगरी उत्सव की प्रतीक्षा में थी। हर किसी के मन में एक ही खुशी थी कि अब उनके प्रिय राम अयोध्या के राजा बनने जा रहे हैं। लेकिन नियति ने ऐसा मोड़ लिया कि राजतिलक के स्थान पर वनवास की घोषणा हो गई।
एक ओर राजमुकुट था, दूसरी ओर चौदह वर्षों का कठिन वनवास। एक ओर सुख-सुविधाओं से भरा राजमहल था, दूसरी ओर जंगलों की कठिन राह। लेकिन भगवान श्रीराम ने न तो किसी से शिकायत की और न ही अपने अधिकार के लिए कोई विवाद खड़ा किया। उन्होंने पिता के वचन और परिवार की मर्यादा को सर्वोपरि रखते हुए चौदह वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया।
यही तो श्रीराम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता थी। उनके लिए राजसिंहासन से बड़ा पिता का सम्मान था, अधिकार से बड़ी मर्यादा थी और सुख-सुविधाओं से बड़ा कर्तव्य था।
वनवास का मार्ग आसान नहीं था। जंगलों की कठिनाइयां, परिस्थितियों की चुनौतियां, अपनों से दूरी और जीवन के अनेक संघर्ष… इन सबके बीच भी श्रीराम ने धैर्य, साहस और मर्यादा का मार्ग नहीं छोड़ा। उन्होंने यह सिखाया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने सिद्धांतों और संस्कारों से समझौता नहीं करना चाहिए।
चौदह वर्ष बीत गए। अयोध्या की आंखें अपने राम की राह देखती रहीं। भरत ने राजसिंहासन पर स्वयं बैठने के बजाय श्रीराम की चरण पादुकाओं को रखकर राज्य का संचालन किया। यह केवल भाई का प्रेम नहीं था, बल्कि त्याग, विश्वास और समर्पण की अद्भुत मिसाल थी।
फिर वह शुभ घड़ी आई, जब चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर भगवान श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे। सोचिए, उस दिन अयोध्या का दृश्य कैसा रहा होगा! जिस नगरी ने वर्षों तक अपने राम की प्रतीक्षा की थी, आज उसका हर रास्ता स्वागत के लिए तैयार था। घर-घर दीप जलाए गए, गलियां रोशनी से जगमगा उठीं और हर हृदय आनंद से भर गया।
वह दीप केवल मिट्टी के छोटे-छोटे पात्रों में जलती लौ नहीं थे, वे चौदह वर्षों की प्रतीक्षा के बाद लौटे विश्वास, प्रेम और आशा के प्रतीक थे। अयोध्या का हर घर मानो यही कह रहा था—हमारे राम लौट आए हैं!
इसी पावन प्रसंग की स्मृति में दीपावली का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व हमें केवल घरों में दीप जलाने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि अपने भीतर भी प्रेम, सत्य, करुणा, धैर्य और मर्यादा का दीप प्रज्वलित करने का संदेश देता है।
आज जब हम दीपावली की पूर्व संध्या पर अपने घरों को सजाते हैं, दीपक जलाते हैं और अपनों के साथ खुशियां बांटते हैं, तो एक बार स्वयं से भी पूछें—क्या हम भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतार रहे हैं? क्या हम अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं? क्या हम अपने वचनों का पालन करते हैं? क्या हम रिश्तों में प्रेम और विश्वास बनाए रखते हैं? क्या हम कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और मर्यादा का साथ देते हैं?
भगवान श्रीराम ने चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार कर यह सिखाया कि महानता पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि त्याग, आचरण और संस्कारों से मिलती है। अयोध्या में जले दीप हमें याद दिलाते हैं कि अंधकार कितना भी लंबा क्यों न हो, विश्वास और धैर्य की रोशनी एक दिन अवश्य लौटती है।
इस दीपावली आइए, केवल अपने घरों को ही नहीं, अपने मन को भी रोशन करें। किसी के जीवन में उम्मीद का दीप जलाएं, रिश्तों में प्रेम बनाए रखें, बड़ों का सम्मान करें और अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से निभाएं।
क्योंकि सच्ची दीपावली तभी होगी, जब हमारे घरों के दीपों के साथ-साथ हमारे व्यवहार में भी श्रीराम के आदर्शों का प्रकाश दिखाई देगा।
आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। — गजेन्द्र लोहार
