एनपी न्यूज 24/ गजेन्द्र मालवीय, डेस्क
पंचायतीराज चुनाव 2026 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, गांवों की राजनीति में हलचल तेज होती जा रही है। इस बीच सबसे बड़ा मुद्दा उभरकर सामने आ रहा है—जनता की जागरूकता। चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह तय करते हैं कि आने वाले पांच वर्षों में गांव किस दिशा में आगे बढ़ेगा। सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी संभव है, जब पंचायत स्तर पर सही नेतृत्व चुना जाए।
पिछले चुनावों का अनुभव यह बताता है कि कई स्थानों पर वोट का उपयोग सोच-समझकर नहीं किया गया। कहीं दबाव, कहीं लालच और कहीं सामाजिक प्रभाव के चलते ऐसे प्रतिनिधि चुन लिए गए, जो सत्ता में पहुंचने के बाद जनता से दूर हो गए। नतीजा यह हुआ कि विकास कागजों में सिमट गया और वास्तविक जरूरतें जस की तस बनी रहीं। यही कारण है कि इस बार चुनाव से पहले जागरूकता को सबसे बड़ा मुद्दा माना जा रहा है।
पंचायत में आने वाला हर फंड जनता के टैक्स और सरकारी योजनाओं से जुड़ा होता है। यदि उसकी पारदर्शिता नहीं होगी, तो भ्रष्टाचार पनपेगा और गांव पीछे रह जाएगा। जागरूक मतदाता वही होता है, जो केवल चुनाव के दिन नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में सवाल पूछे, ग्राम सभा में भाग ले और काम का हिसाब मांगे। इससे न केवल पंचायत मजबूत होती है, बल्कि जनप्रतिनिधियों पर भी जवाबदेही बनी रहती है।
चुनाव से पहले यह समझना जरूरी है कि पंचायतीराज व्यवस्था लोकतंत्र की नींव है। सरपंच और वार्डपंच गांव के सबसे नजदीकी प्रतिनिधि होते हैं, जिनके फैसले सीधे आम आदमी के जीवन को प्रभावित करते हैं। यदि मतदाता जागरूक होकर ईमानदार, सक्षम और जवाबदेह व्यक्ति को चुनता है, तो गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं में वास्तविक सुधार देखने को मिल सकता है।
पंचायतीराज चुनाव 2026 से पहले जन-जागरूकता का यह दौर गांवों के लिए एक अवसर है—अपने भविष्य को सही दिशा देने का। वोट की कीमत समझकर लिया गया फैसला ही गांव को आत्मनिर्भर, पारदर्शी और विकासशील बना सकता है।
