एनपी न्यूज 24/ गजेन्द्र मालवीय, डेस्क
हाईकोर्ट की डेडलाइन आज पूरी, लाखों मतदाताओं और हजारों दावेदारों की नजर आयोग की रिपोर्ट पर
जयपुर, 20 जून। राजस्थान में लंबे समय से लंबित पंचायतीराज एवं नगरीय निकाय चुनावों की दिशा और दशा तय करने वाला दिन शनिवार को आ गया है। OBC आरक्षण को लेकर गठित राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग को रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए हाईकोर्ट द्वारा दी गई समय-सीमा आज समाप्त हो रही है। ऐसे में पूरे प्रदेश की नजर आयोग की रिपोर्ट और सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।
राजस्थान में पंचायत समिति, जिला परिषद, सरपंच एवं वार्ड पंचों का कार्यकाल समाप्त हुए कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन OBC आरक्षण निर्धारण, परिसीमन और अन्य प्रक्रियाओं के कारण चुनाव अब तक नहीं हो पाए हैं। मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने चुनाव प्रक्रिया में हो रही देरी पर नाराजगी जताते हुए आयोग को 20 जून तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने तथा राज्य निर्वाचन आयोग को 31 जुलाई तक चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।
पांच महीने से अटकी प्रक्रिया
जानकारी के अनुसार OBC आरक्षण के निर्धारण के लिए आयोग पिछले कई महीनों से प्रदेशभर से आंकड़े जुटाने और अध्ययन करने में लगा हुआ है। इस प्रक्रिया पर करोड़ों रुपये खर्च होने की चर्चा है, लेकिन रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हो सकी है। रिपोर्ट में देरी के कारण चुनावी कार्यक्रम की घोषणा भी अटकी हुई है।
पहले भी टल चुके हैं चुनाव
राजस्थान में पंचायत चुनावों को लेकर यह पहला अवसर नहीं है जब देरी की स्थिति बनी हो। पूर्व में परिसीमन, आरक्षण निर्धारण और प्रशासनिक कारणों से चुनाव कार्यक्रम प्रभावित होते रहे हैं। हालांकि इस बार OBC आरक्षण का मुद्दा सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आया है, जिसके चलते चुनावों की पूरी प्रक्रिया ठहर सी गई है।
प्रदेशभर के दावेदारों की बढ़ी बेचैनी
पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हजारों संभावित उम्मीदवार, जनप्रतिनिधि और राजनीतिक कार्यकर्ता पिछले कई महीनों से चुनाव कार्यक्रम की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। गांव-गांव में चुनावी चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं, लेकिन आधिकारिक कार्यक्रम घोषित नहीं होने से स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
अब आगे क्या?
यदि आयोग समय पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देता है तो राज्य सरकार आरक्षण संबंधी प्रक्रिया को अंतिम रूप देकर चुनाव कार्यक्रम घोषित करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। वहीं रिपोर्ट में देरी या किसी नए कानूनी विवाद की स्थिति में चुनावों का कार्यक्रम फिर प्रभावित हो सकता है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आयोग अपनी रिपोर्ट कब प्रस्तुत करता है और सरकार तथा राज्य निर्वाचन आयोग आगे क्या निर्णय लेते हैं।
