झाड़ोल में गवरी ने दी दस्तक, सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब
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रिपोर्ट - बबलू वेद, झाड़ोल

झाड़ोल। मेवाड़ की मिट्टी में रची-बसी आदिवासी लोकसंस्कृति एक बार फिर अपने पूरे रंग में नजर आई। झाड़ोल में गवरी ने दस्तक दे दी है। गवरी का नाम आते ही गांव का चौक, मादल की थाप, पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, अभिनय और हजारों दर्शकों की भीड़ आंखों के सामने जीवंत हो उठती है। तस्वीर में भी कुछ ऐसा ही नजारा दिखाई दे रहा है—जहां गवरी केवल मंच पर होने वाला कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरा गांव एक साथ जुड़कर जीने वाली सांस्कृतिक परंपरा बन गया है।


जहां दर्शक नहीं, पूरा गांव बन जाता है गवरी का हिस्सा


झाड़ोल में सामने आई तस्वीर अपने आप में बहुत कुछ कहती है। खुले मैदान में बड़ी संख्या में ग्रामीण बैठे हैं। महिलाएं पारंपरिक परिधानों में नजर आ रही हैं, युवा और बुजुर्ग गवरी के पात्रों को देखने के लिए एकत्र हैं और बीच में कलाकार अपनी प्रस्तुति से माहौल को जीवंत कर रहे हैं।


यह दृश्य बताता है कि गवरी आज भी ग्रामीण समाज की सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान से कितनी गहराई से जुड़ी हुई है।


गवरी मेवाड़ की प्रमुख जनजातीय लोकनाट्य परंपराओं में शामिल है। इसमें नृत्य, संगीत, संवाद, अभिनय और धार्मिक-सामाजिक कथाओं का अनूठा मेल देखने को मिलता है। 


40 दिन तक चलने वाली परंपरा, नियमों के साथ निभाते हैं कलाकार


गवरी का आयोजन सामान्य मनोरंजन भर नहीं माना जाता। परंपरा के अनुसार कलाकार लंबे समय तक गवरी साधना से जुड़े रहते हैं और कई दलों में कठोर नियमों एवं अनुशासन का पालन किया जाता है। मेवाड़ में रक्षाबंधन के बाद गवरी के आयोजन शुरू होने की परंपरा रही है और इसका सिलसिला करीब 40 दिनों तक गांव-गांव चलता है। 


यही वजह है कि गवरी के शुरू होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में अलग ही सांस्कृतिक माहौल बन जाता है। दिन का कामकाज अपनी जगह और गवरी का रंग अपनी जगह।


गांव का चौक बना रंगमंच, लोग बने दर्शक और संस्कृति बनी नायक


झाड़ोल की इस तस्वीर का सबसे मजबूत पक्ष यही है कि यहां किसी बड़े आधुनिक मंच की जरूरत नजर नहीं आती। खुला मैदान ही रंगमंच है और आसपास मौजूद ग्रामीण ही गवरी के दर्शक।


एक तरफ मोटरसाइकिलें और रोजमर्रा की जिंदगी दिखाई देती है तो दूसरी तरफ उसी जगह लोक कलाकार अपनी सदियों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाते नजर आते हैं। यही गवरी की असली ताकत है—यह संस्कृति को संग्रहालय में बंद नहीं रखती, बल्कि उसे गांव की जिंदगी के बीच जीवित रखती है।


नई पीढ़ी के लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं, अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर


आज जब ग्रामीण जीवन में आधुनिक मनोरंजन के साधन तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में गवरी जैसी परंपराएं नई पीढ़ी के सामने अपनी जड़ों को पहचानने का अवसर देती हैं।


गवरी में आने वाले पात्र, संवाद, लोककथाएं और सामाजिक प्रसंग केवल मनोरंजन नहीं करते, बल्कि स्थानीय इतिहास, सामाजिक जीवन और जनजातीय सांस्कृतिक स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे पहुंचाने का काम भी करते हैं। शोध एवं सांस्कृतिक स्रोत भी गवरी को धार्मिक आस्था, सामाजिक परंपरा और कलात्मक अभिव्यक्ति के संगम के रूप में रेखांकित करते हैं। 


झाड़ोल के लिए गवरी क्यों है खास?


झाड़ोल और आसपास का क्षेत्र आदिवासी संस्कृति की मजबूत जड़ों वाला इलाका है। ऐसे में गवरी का आयोजन यहां केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि क्षेत्र की पहचान का उत्सव बन जाता है।


इतिहास में भी झाड़ोल क्षेत्र के गांवों के गवरी दलों द्वारा उदयपुर में प्रस्तुतियां दिए जाने के उदाहरण मिलते हैं। 


आज झाड़ोल में उमड़ी भीड़ इस बात का संकेत है कि लोक संस्कृति की पकड़ अभी कमजोर नहीं हुई है। बल्कि सही अवसर मिलने पर लोग आज भी उसी उत्साह से अपनी परंपराओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं।



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गवरी का संदेश साफ है—संस्कृति अभी जिंदा है


झाड़ोल में गवरी की दस्तक को केवल एक आयोजन की तरह देखना इस परंपरा के महत्व को छोटा करना होगा।


यह उस संस्कृति की आवाज है, जो पीढ़ियों से मादल की थाप पर चलती आई है।

यह उन कलाकारों की मेहनत है, जो आधुनिक दौर में भी परंपरा का भार अपने कंधों पर उठाए हुए हैं।

यह उन ग्रामीणों का जुड़ाव है, जो आज भी अपनी लोक विरासत के लिए घंटों बैठकर प्रस्तुति देखते हैं।

और यह नई पीढ़ी के लिए संदेश है कि विकास और आधुनिकता के बीच अपनी जड़ों को भूलना जरूरी नहीं है।


झाड़ोल में गवरी ने दस्तक नहीं दी… अपनी पहचान फिर से दर्ज कराई है।


मादल की थाप गूंजेगी, पात्र उतरेंगे मैदान में, गांव जुटेगा और मेवाड़ की लोकसंस्कृति फिर अपनी कहानी सुनाएगी।


गवरी सिर्फ नृत्य नहीं—मेवाड़ की मिट्टी की आवाज है।