रिपोर्ट - बबलू वेद, झाड़ोल
झाड़ोल। उम्र महज 35 वर्ष, लेकिन संघर्ष का सफर करीब डेढ़ दशक से भी ज्यादा लंबा। नाम है श्रवण सिंह पड़ियार, निवासी वेलनिया, झाड़ोल। क्षेत्र में यह नाम सिर्फ एक व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि गरीब, कमजोर और अपने हक के लिए आवाज उठाने वाले लोगों की उम्मीद के तौर पर देखा जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखरता, सूचना के अधिकार का इस्तेमाल और सरकारी जमीनों पर कथित अतिक्रमण के मामलों को सामने लाने की सक्रियता ने उन्हें झाड़ोल क्षेत्र में एक चर्चित आरटीआई कार्यकर्ता और समाजसेवी के रूप में पहचान दिलाई है।
श्रवण सिंह पड़ियार ने बेहद कम उम्र में ही सरकारी तंत्र में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाने का रास्ता चुना। उनके बारे में बताया जाता है कि करीब 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने एंटी करप्शन ब्यूरो की कार्रवाई में अहम भूमिका निभाते हुए तत्कालीन सीडीपीओ को ट्रैप करवाने की कार्रवाई तक मामला पहुंचाया। इतनी कम उम्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाया गया यह कदम उनके संघर्ष की शुरुआत माना जाता है।
इसके बाद सूचना का अधिकार उनके लिए महज कानून नहीं, बल्कि व्यवस्था से सवाल पूछने का हथियार बन गया। ग्राम पंचायत ब्राह्मणों का खेरवाड़ा में आरटीआई के जरिए मांगी गई सूचनाओं के आधार पर कई वर्षों पुराने सीसी रोड से जुड़े कथित गबन का मामला सामने आने का दावा किया जाता है। इसके अलावा क्षेत्र की अलग-अलग ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों, सरकारी राशि के उपयोग और अन्य मामलों से जुड़ी सूचनाएं मांगकर कथित अनियमितताओं को उजागर करने का सिलसिला जारी रहा।
आरटीआई बनी हथियार, दस्तावेज बने सबसे बड़ा जवाब
श्रवण सिंह की कार्यशैली का सबसे मजबूत पक्ष यही बताया जाता है कि वे आरोप लगाने के बजाय दस्तावेज और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर सवाल खड़े करने पर जोर देते हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से सरकारी कार्यालयों और ग्राम पंचायतों से जानकारी प्राप्त कर संबंधित मामलों को सामने लाने का प्रयास उनकी पहचान बन चुका है।
झाड़ोल क्षेत्र में आरटीआई कार्यकर्ता के रूप में उनकी सक्रियता के चलते कई सरकारी कार्यों और पंचायत स्तरीय मामलों पर सवाल उठे हैं। उनका कहना है कि सरकारी पैसा जनता का पैसा है और उसके एक-एक रुपए का हिसाब जनता को मिलना चाहिए।
भूमाफियाओं और अतिक्रमण के खिलाफ भी मोर्चा
भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के साथ श्रवण सिंह पड़ियार ने कथित भूमाफियाओं और सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण के मामलों को लेकर भी अधिकारियों के समक्ष शिकायतें और आपत्तियां दर्ज कराईं। चारागाह और बिलानाम भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए कार्रवाई करवाने के उनके प्रयासों का भी क्षेत्र में उल्लेख किया जाता है।
सरकारी जमीन पर कब्जे के मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाना, रिकॉर्ड खंगालना और कार्रवाई की मांग करना उनके सामाजिक सरोकार का एक अहम हिस्सा रहा है। यही वजह है कि झाड़ोल क्षेत्र में उनका नाम उन लोगों में लिया जाता है जो सरकारी व्यवस्था के सामने आम लोगों की समस्याएं रखने से पीछे नहीं हटते।
'गलत काम के खिलाफ आवाज उठाना ही मेरा मकसद'
श्रवण सिंह पड़ियार की पहचान किसी राजनीतिक पद से नहीं, बल्कि लगातार सक्रिय रहकर सवाल उठाने वाले व्यक्ति के रूप में बनी है। समर्थक उन्हें गरीब और कमजोर वर्ग की आवाज बताते हैं, जबकि उनके संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत उनकी बेबाकी और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर सवाल उठाने की शैली मानी जाती है।
क्षेत्र में उनकी प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंच और संवाद भी चर्चा का विषय रहती है। किसी मामले को संबंधित विभाग तक पहुंचाना और कार्रवाई की मांग करना उनकी सक्रियता का हिस्सा रहा है। हालांकि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों या भ्रष्टाचार के मामलों की अंतिम पुष्टि सक्षम जांच अथवा न्यायिक प्रक्रिया से ही होती है।
एक नाम, जिसने सवाल पूछने की हिम्मत दिखाई
झाड़ोल जैसे ग्रामीण क्षेत्र में जहां आम आदमी अक्सर सरकारी दफ्तरों की प्रक्रिया और कागजी कार्रवाई में उलझ जाता है, वहां आरटीआई के जरिए सरकारी सूचनाएं मांगना और उन सूचनाओं के आधार पर सवाल खड़े करना आसान काम नहीं है। श्रवण सिंह पड़ियार ने कम उम्र में इस रास्ते को चुना और लगातार सक्रिय रहे।
आज 35 वर्ष की उम्र में श्रवण सिंह पड़ियार की पहचान एक ऐसे आरटीआई कार्यकर्ता और समाजसेवी के रूप में उभरी है, जो भ्रष्टाचार, कथित अनियमितताओं, सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और जनहित के मुद्दों को लेकर आवाज उठाने से पीछे नहीं हटते।
उनकी कहानी यही संदेश देती है कि व्यवस्था बदलने के लिए हमेशा बड़ी कुर्सी जरूरी नहीं होती—कभी-कभी एक जागरूक नागरिक, एक आरटीआई आवेदन और सही सवाल ही पूरी व्यवस्था को जवाब देने के लिए मजबूर कर देते हैं।
