राजस्थान पोर्टल के नाम पर 250 करोड़ स्वाहा: कागजों में निस्तारण, हकीकत में समस्या जारी
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एनपी न्यूज 24/ गजेन्द्र लोहार, डेस्क

राजस्थान के आम आदमी को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से बचाने के लिए राजस्थान सम्पर्क पोर्टल और 181 हेल्पलाइन शुरू की गई थी। उम्मीद थी कि फरियादी अपनी शिकायत सरकार तक पहुंचाएगा और उसकी समस्या का समाधान होगा। व्यवस्था बनी, कॉल सेंटर बना, सॉफ्टवेयर आया, अधिकारी जोड़े गए और करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन सवाल यह है कि इस पूरी कवायद का फायदा आखिर किसे मिला—शिकायतकर्ता को या सरकारी रिकॉर्ड को?


सरकार के अपने दस्तावेज बताते हैं कि राजस्थान सम्पर्क 2.0 के लिए तीन साल की परियोजना पर करीब 247.50 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई। इसमें एप्लीकेशन, कॉल सेंटर, संचालन, प्रशिक्षण और दूसरे खर्च शामिल हैं। यानी जनता की शिकायत सुनने और उसका समाधान कराने के लिए सरकार ने एक ऐसा तंत्र खड़ा किया जिस पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होने हैं। लेकिन असली सवाल खर्च का नहीं, नतीजे का है।


राजस्थान सम्पर्क पर शिकायत दर्ज करना आज बेहद आसान है। मोबाइल उठाइए, 181 मिलाइए या पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर दीजिए। शिकायत आगे बढ़ जाती है और कुछ समय बाद संदेश आता है कि शिकायत का निस्तारण कर दिया गया। यहीं से उस नागरिक की असली परीक्षा शुरू होती है। क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में शिकायत का निस्तारण हो जाना और जमीन पर समस्या का समाप्त हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं।


सड़क टूटी है तो शिकायत होती है। नाली जाम है तो शिकायत होती है। अतिक्रमण है तो शिकायत होती है। बिजली-पानी की समस्या है तो शिकायत होती है। किसी कार्यालय में अधिकारी सुनवाई नहीं कर रहा तो शिकायत होती है। शिकायत संबंधित विभाग तक जाती है और विभाग अपनी रिपोर्ट लगा देता है। मामला बंद। लेकिन क्या सड़क बन गई? क्या नाली साफ हो गई? क्या अतिक्रमण हट गया? क्या अधिकारी ने काम कर दिया? क्या नागरिक को वास्तव में राहत मिली?


यही वह सवाल है जिसका जवाब केवल ‘निस्तारित’ शब्द से नहीं दिया जा सकता। सरकार की आर्थिक समीक्षा के मुताबिक वर्ष 2025 में राजस्थान सम्पर्क पर 34.43 लाख शिकायतें दर्ज हुईं और 33.88 लाख से अधिक का निस्तारण बताया गया। सरकार इसे 98 प्रतिशत से अधिक समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है। कागज पर यह उपलब्धि बड़ी दिखाई देती है। लेकिन यदि निस्तारण का अर्थ वास्तव में समस्या का समाधान है तो फिर जनता को बार-बार उसी समस्या के लिए शिकायत क्यों करनी पड़ती है? 


किसी मोहल्ले में सड़क की समस्या एक बार शिकायत करने से खत्म होनी चाहिए। यदि उसी सड़क को लेकर बार-बार शिकायत करनी पड़ रही है तो सरकार को यह देखना होगा कि पहली शिकायत में हुआ क्या था। यहीं राजस्थान सम्पर्क की पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता कसौटी पर आती है। शिकायत बंद करना आसान है, समस्या खत्म करना मुश्किल। और यही फर्क सरकारी आंकड़ों और जनता के अनुभव के बीच दिखाई देता है।


राजस्थान सम्पर्क को केवल शिकायतों की संख्या और निस्तारण प्रतिशत से नहीं आंका जाना चाहिए। सरकार के पास अब लाखों शिकायतों का विशाल डेटाबेस है। इससे यह पता लगाना मुश्किल नहीं कि कौन सा विभाग जनता को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है, किस जिले में कौन सी समस्या बार-बार सामने आ रही है और किन अधिकारियों या विभागों के खिलाफ लगातार शिकायतें हो रही हैं। यदि एक ही प्रकार की शिकायत बार-बार आती है तो वह सिर्फ नागरिक की शिकायत नहीं है, बल्कि प्रशासन की विफलता का प्रमाण है।


मसलन, किसी नगर निकाय के खिलाफ लगातार अतिक्रमण की शिकायतें आ रही हैं। शिकायतें निस्तारित भी हो रही हैं। फिर भी अतिक्रमण कायम है। इसका मतलब साफ है कि सिस्टम शिकायत को तो निपटा रहा है, लेकिन समस्या को नहीं। इसी तरह यदि किसी विभाग के खिलाफ लगातार शिकायतें आती रहें और हर बार विभाग अपनी रिपोर्ट लगाकर मामले बंद करता रहे तो सवाल शिकायतकर्ता पर नहीं, उस विभाग की कार्यप्रणाली पर उठना चाहिए। आखिर करोड़ों रुपये खर्च करके बनाया गया यह तंत्र जनता की परेशानी कम कर रहा है या सरकारी फाइलों का बोझ कम कर रहा है?


राजस्थान सम्पर्क 2.0 को सरकार ने आधुनिक, रियल टाइम मॉनिटरिंग और डेटा आधारित निगरानी वाली व्यवस्था के रूप में पेश किया है। यदि तकनीक इतनी सक्षम है तो फिर केवल शिकायत निस्तारण की संख्या क्यों दिखाई जाए? सरकार को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि कितनी शिकायतों के बाद वास्तव में समस्या खत्म हुई, कितने शिकायतकर्ता समाधान से संतुष्ट हुए और कितने मामलों में शिकायत दोबारा सामने आई। जनता को यह जानने का भी अधिकार है कि 181 और राजस्थान सम्पर्क पर खर्च हो रहे करोड़ों रुपये के बदले उसे वास्तविक राहत कितनी मिली। क्योंकि यह पैसा किसी कंपनी या अधिकारी की जेब से नहीं जा रहा। यह जनता के टैक्स का पैसा है।


राजस्थान सम्पर्क का उद्देश्य यह नहीं था कि नागरिक शिकायत करे, विभाग जवाब दे और कम्प्यूटर पर मामला बंद हो जाए। उद्देश्य यह था कि नागरिक की समस्या खत्म हो। इसलिए अब सरकार को ‘कितनी शिकायतें निस्तारित हुईं’ बताने के बजाय यह बताना चाहिए कि कितनी समस्याएं वास्तव में खत्म हुईं। जब तक यह फर्क साफ नहीं किया जाता, तब तक 98 प्रतिशत निस्तारण का आंकड़ा चाहे सरकारी फाइलों में कितना ही चमकदार क्यों न हो, जमीन पर परेशान नागरिक के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।


राजस्थान सम्पर्क जनता के लिए बनाया गया था। इसलिए इसकी सफलता का प्रमाण भी सरकारी आंकड़े नहीं, जनता का अनुभव होना चाहिए। 250 करोड़ की इस व्यवस्था से जनता को आखिर मिला क्या? बाबाजी का ठुल्लू । अगर जवाब केवल इतना है कि लाखों शिकायतें ‘निस्तारित’ कर दी गईं, तो फिर अगला सवाल और ज्यादा गंभीर है । शिकायत निस्तारित हुई है या सिर्फ फाइल बंद हुई है?


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