एनपी न्यूज 24/ गजेन्द्र लोहार, डेस्क
त्योहारों के बीच अब लोकतंत्र का पर्व, गांवों में चुनावी तैयारियां तेज
जयपुर। राजस्थान में पंचायती राज चुनाव को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। 30 सितंबर तक पंचायत चुनाव की आचार संहिता लग जाएगी, जिसके बाद गांवों में चुनावी गतिविधियां और तेज होने की उम्मीद है। हालिया रिपोर्टों में 30 सितंबर के आसपास आचार संहिता लागू होने की जानकारी सामने आई है।
पंचायती राज चुनाव को लेकर सरपंच और वार्डपंच पदों के संभावित दावेदारों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। आरक्षण प्रक्रिया और चुनावी तैयारियों के बीच गांवों में संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। कई दावेदार मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क कर अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं।
त्योहारों के साथ लोकतंत्र का त्योहार
इस बार गांवों में त्योहारों की रौनक के साथ लोकतंत्र के पर्व का उत्साह भी देखने को मिलेगा। एक तरफ त्योहारी आयोजन चल रहे हैं, तो दूसरी तरफ पंचायत चुनाव को लेकर गांव की चौपालों और बैठकों में राजनीतिक चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं।
आचार संहिता लागू होने के बाद चुनाव से जुड़े प्रचार-प्रसार और सरकारी गतिविधियां निर्वाचन आयोग के नियमों के दायरे में आ जाएंगी। सामान्य तौर पर चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता प्रभावी होती है।
किसके सिर सजेगा गांव की सरकार का ताज?
आचार संहिता लगने के साथ ही चुनावी मैदान में उतरने वाले दावेदारों की तस्वीर और स्पष्ट होने लगेगी। कौन सरपंच बनेगा? कौन वार्डपंच का चुनाव लड़ेगा? किसे जनता का समर्थन मिलेगा? इन सवालों को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा तेज है।
संभावित उम्मीदवारों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने-अपने वार्ड और पंचायत में मतदाताओं का भरोसा जीतने की होगी। सड़क, पानी, नाली, बिजली, आवास, रोजगार और पंचायत स्तर की अन्य समस्याएं चुनावी मुद्दे बन सकती हैं।
अब नजर चुनाव कार्यक्रम पर
राजस्थान में पंचायत चुनावों की प्रक्रिया को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग की तैयारियां जारी हैं। आधिकारिक चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद नामांकन, जांच, नाम वापसी, चुनाव चिन्ह और मतदान सहित पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। चुनाव संबंधी आधिकारिक जानकारी के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश महत्वपूर्ण होंगे।
30 सितंबर तक आचार संहिता—इसके बाद गांवों में चुनावी रंग और गहरा होने वाला है।
त्योहारों के मौसम में अब धार्मिक उत्सव के साथ लोकतंत्र का उत्सव भी देखने को मिलेगा। मतदाताओं के लिए यह अपने क्षेत्र की सरकार चुनने का महत्वपूर्ण अवसर होगा।
बड़ा सवाल
क्या इस बार गांव की जनता पुराने चेहरों पर भरोसा जताएगी या नए चेहरों को मौका देगी?
किसके पक्ष में बनेगा माहौल और किसकी बदलेगी राजनीतिक तस्वीर?
