रिपोर्ट - प्रवीण वेद (बबलू), झाड़ोल
झाड़ोल क्षेत्र के मगवास गांव में एक ऐसी मार्मिक घटना सामने आई जिसने समाज को भावुक भी किया और सोचने पर मजबूर भी। यहां एक बुजुर्ग महिला के निधन के बाद उनकी दो बेटियों ने न केवल अंतिम संस्कार की सभी जिम्मेदारियां निभाईं, बल्कि अर्थी को कंधा देकर यह संदेश भी दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं।
मगवास गांव निवासी मणि देवी पत्नी स्वर्गीय उमाशंकर जी जोशी का वृद्धावस्था के चलते निधन हो गया। बताया गया कि मणि देवी पिछले करीब 15 वर्षों से अस्वस्थ थीं और बेड रेस्ट पर थीं। इस लंबे समय में उनकी दोनों बेटियां कांता बेन और सुरज बेन समय-समय पर अपने ससुराल से आकर मां की सेवा-सुश्रुषा करती रहीं। उन्होंने मां की देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी और हर परिस्थिति में उनका साथ निभाया।
मां के निधन के बाद जब अंतिम यात्रा निकली तो गांव के लोगों ने एक भावुक दृश्य देखा। दोनों बेटियों ने अपनी मां की अर्थी को कंधा देकर बेटों का फर्ज निभाया। श्मशान घाट तक पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में भाग लेकर उन्होंने समाज को एक मजबूत संदेश दिया कि रिश्तों की जिम्मेदारी केवल बेटों तक सीमित नहीं है, बेटियां भी हर कर्तव्य निभाने में सक्षम हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि दोनों बेटियां हमेशा अपनी मां के प्रति समर्पित रहीं। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सेवा, संस्कार और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को सर्वोपरि रखा। अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं और हर कोई बेटियों के इस साहस, संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा की सराहना करता नजर आया।
आज भी समाज के कई हिस्सों में अंतिम संस्कार जैसे कार्यों को केवल बेटों का अधिकार और जिम्मेदारी माना जाता है, लेकिन मगवास गांव की इस घटना ने पुरानी सोच को बदलने का कार्य किया है। कांता बेन और सुरज बेन ने यह साबित कर दिया कि सच्चा रिश्ता वही होता है जो हर सुख-दुख और अंतिम समय तक साथ निभाए।
यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। ऐसी बेटियां समाज का गौरव हैं, जो अपने संस्कारों, सेवा भाव और जिम्मेदारी से नई पीढ़ी के सामने आदर्श प्रस्तुत कर रही हैं।
हमें गर्व है ऐसी बेटियों पर।
