अफ्रीकी विशाल घोंघा प्रबंधन में 60 से 70 प्रतिशत तक सफलता
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एनपी न्यूज 24/ गजेन्द्र लोहार, डेस्क

बिछीवाड़ा में किसान गोष्ठी आयोजित, वैज्ञानिकों ने किसानों को बताए समेकित प्रबंधन के उपाय

उदयपुर, 24 सितम्बर 2026। उदयपुर जिले के फलासिया पंचायत समिति क्षेत्र की ग्राम पंचायत बिछीवाड़ा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान संस्थान (ICAR-NRIIPM), नई दिल्ली की जनजातीय उप-योजना (TSP) के अंतर्गत “अफ्रीकी विशाल घोंघे का समेकित प्रबंधन : एक सफलता की कहानी” विषय पर किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में क्षेत्र के सैकड़ों किसान एवं ग्रामीण, कृषि अधिकारी, वैज्ञानिक और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. रमण थंगावेलु, निदेशक, ICAR-NRIIPM, नई दिल्ली रहे। उन्होंने कृषि में समेकित नाशीजीव प्रबंधन (IPM) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसानों की सक्रिय भागीदारी और वैज्ञानिक तकनीकों के समन्वित उपयोग से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले नाशीजीवों का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है। उन्होंने अफ्रीकी विशाल घोंघे के नियंत्रण को किसानों और वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयासों का उदाहरण बताया।

कार्यक्रम का स्वागत भाषण डॉ. पी.सी. भटनागर, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र ने दिया। उन्होंने क्षेत्र में बढ़ती घोंघे की समस्या और किसानों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया।

फसलों के लिए नुकसानदायक है अफ्रीकी विशाल घोंघा

मुख्य वैज्ञानिक वक्ता डॉ. श्रवण मनभर हलधर, प्रधान वैज्ञानिक, ICAR-NRIIPM, नई दिल्ली ने अफ्रीकी विशाल घोंघे के समेकित प्रबंधन पर किसानों को विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अफ्रीकी विशाल घोंघा अनेक प्रकार की फसलों एवं पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है। यह पत्तियों को खाकर उनमें छेद करता है तथा फल, सब्जियों और कोमल पौधों को भी प्रभावित करता है।

उन्होंने किसानों को बताया कि घोंघे के नियंत्रण के लिए केवल रासायनिक उपायों पर निर्भर रहने के बजाय शस्य, यांत्रिक, जैविक और आवश्यकता के अनुसार रासायनिक उपायों को एक साथ अपनाना अधिक प्रभावी होता है।

सुबह-शाम निगरानी की सलाह

वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी कि विशेषकर बारिश एवं अधिक नमी के समय खेतों की नियमित निगरानी की जाए। घोंघे अक्सर नमी वाली एवं छायादार जगहों, खरपतवार, कचरे और खेत में पड़े अवशेषों के नीचे छिपे रहते हैं। इसलिए खेत एवं मेड़ों की सफाई, खरपतवार नियंत्रण और जलभराव रोकने पर जोर दिया गया।

किसानों को सुबह एवं शाम घोंघों को दस्ताने पहनकर एकत्रित करने, उनके अंडों को खोजकर नष्ट करने तथा खेत में लकड़ी के टुकड़े, बोरी या केले के पत्ते रखकर उनके नीचे छिपे घोंघों को एकत्रित करने की जानकारी दी गई।

जैविक एवं प्राकृतिक नियंत्रण पर जोर

गोष्ठी में घोंघों के प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण पर भी जोर दिया गया। किसानों को पक्षियों और मेंढकों जैसे प्राकृतिक शत्रुओं को संरक्षण देने तथा परिस्थितियों के अनुसार बतखों के उपयोग की जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि समेकित तरीके से किए गए नियंत्रण उपायों से घोंघे की संख्या और फसलों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

प्रकोप में 60 से 70 प्रतिशत तक कमी

डॉ. श्रवण मनभर हलधर ने बताया कि ICAR-NRIIPM द्वारा विकसित समेकित प्रबंधन तकनीकों का किसानों के खेतों पर प्रदर्शन किया गया। उनके अनुसार इन प्रयासों के परिणामस्वरूप अफ्रीकी विशाल घोंघे के प्रकोप में 60 से 70 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। उन्होंने इसे वैज्ञानिक अनुसंधान को खेत स्तर तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता बताया।

उन्होंने किसानों से कहा कि घोंघे का प्रकोप बढ़ने का इंतजार करने के बजाय शुरुआत से ही खेतों की निगरानी और प्रबंधन किया जाए, जिससे फसलों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

किसानों ने वैज्ञानिकों से किया सीधा संवाद

कार्यक्रम में डॉ. दीपक कुमार जैन, कीट वैज्ञानिक ने किसानों को अफ्रीकी विशाल घोंघे की पहचान, जीवन चक्र और प्रकोप की स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। वहीं डॉ. पी.एन. मीणा, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने जनजातीय उप-योजना (TSP) के उद्देश्यों एवं किसानों के लिए संचालित विभिन्न कृषि विकास गतिविधियों की जानकारी साझा की।

इस दौरान किसानों ने वैज्ञानिकों से सीधे संवाद कर अपने खेतों में घोंघे के प्रकोप से संबंधित समस्याएं रखीं। वैज्ञानिकों ने किसानों को उनकी समस्याओं के अनुसार व्यावहारिक समाधान एवं समेकित प्रबंधन अपनाने की सलाह दी।

कृषि अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों की रही मौजूदगी

कार्यक्रम में कृषि अधिकारी संजय भारद्वाज एवं अजय जोशी सहित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहे। इस दौरान फलासिया मंडल उपाध्यक्ष फतेह लाल भाट, एसटी मोर्चा अध्यक्ष हरिश अंगारी, पूर्व सरपंच नाथूलाल अगारी, पूर्व पंचायत समिति सदस्य रामलाल मेघवाल, वार्ड पंच रोशनलाल भगोरा, मगन मंदावत सहित ग्राम पंचायत बिछीवाड़ा के सैकड़ों ग्रामीण एवं किसान उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान किसानों ने अफ्रीकी विशाल घोंघे से फसलों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए उपायों को अपनाने में रुचि दिखाई।

किसानों के लिए बनी जागरूकता की मिसाल

किसान गोष्ठी के समापन पर किसानों को नियमित खेत निगरानी, समय पर घोंघों की पहचान और वैज्ञानिक तकनीकों के समेकित उपयोग का संदेश दिया गया। बिछीवाड़ा क्षेत्र में अफ्रीकी विशाल घोंघे के प्रकोप में 60 से 70 प्रतिशत तक कमी दर्ज होने की जानकारी किसानों के लिए उत्साहजनक रही।

यह कार्यक्रम वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों के बीच सीधा संवाद स्थापित करने तथा खेत स्तर पर समेकित नाशीजीव प्रबंधन तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया।