चुनावी मौसम में घर-घर दस्तक, क्या जीत के बाद भी जनता के बीच रहेंगे भावी सरपंच?
Total Views : 112
Zoom In Zoom Out Read Later Print

एनपी न्यूज 24/ गजेन्द्र लोहार, बिछीवाड़ा

वादों की बारिश के बीच मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल—पांच साल की जवाबदेही कौन निभाएगा?

विशेष रिपोर्ट। पंचायतीराज चुनाव 2026 को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। संभावित सरपंच प्रत्याशी इन दिनों गांव-गांव और घर-घर पहुंचकर लोगों से मुलाकात कर रहे हैं। कोई विकास का भरोसा दिला रहा है तो कोई सड़क, पानी, नाली, बिजली, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने के वादे कर रहा है। प्रत्याशी हर परिवार और हर मतदाता से व्यक्तिगत संपर्क कर समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं।

चुनावी माहौल में घरों तक पहुंचने वाले प्रत्याशियों को देखकर ग्रामीणों के बीच भी चर्चाएं तेज हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि चुनाव के बाद क्या यही चेहरे लगातार जनता के बीच नजर आएंगे?

चुनाव के समय हर घर तक पहुंचना आसान, पांच साल जनता के साथ रहना चुनौती

चुनाव के समय प्रत्याशी मतदाताओं के घर पहुंचते हैं, उनका हाल पूछते हैं, समस्याएं सुनते हैं और जीतने के बाद गांव का विकास करने का भरोसा देते हैं। लेकिन सरपंच का पद केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है। जीत के बाद चुने गए प्रतिनिधि के सामने पांच वर्षों तक गांव की समस्याओं, सरकारी योजनाओं, पंचायत के विकास कार्यों और ग्रामीणों की शिकायतों को लेकर जिम्मेदारी रहती है।

ऐसे में मतदाताओं को केवल चुनावी समय में किए जा रहे वादों पर ही निर्भर रहने के बजाय यह भी देखना होगा कि प्रत्याशी जनता के लिए कितना उपलब्ध रहेगा और समस्याओं के समाधान के लिए कितना सक्रिय रहेगा।

वादों से ज्यादा जरूरी है भरोसा और जवाबदेही

ग्रामीण मतदाताओं के सामने इस चुनाव में कई तरह के विकल्प होंगे। ऐसे में फैसला लेते समय प्रत्याशी के व्यवहार, सोच, कार्यशैली, जनसंपर्क और गांव के विकास को लेकर उसकी स्पष्ट सोच को भी देखा जाना जरूरी है।

क्योंकि चुनाव के दौरान किया गया हर वादा पूरा हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन जनता के बीच रहने वाला प्रतिनिधि समस्याओं को सुन सकता है, अधिकारियों तक मुद्दे पहुंचा सकता है और पंचायत स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकता है।

क्या पांच साल तक खुले रहेंगे दरवाजे?

मतदाताओं को यह सवाल भी पूछना चाहिए कि जो प्रत्याशी आज समर्थन मांगने उनके दरवाजे पर खड़ा है, क्या जीत के बाद भी उसके दरवाजे जनता के लिए खुले रहेंगे?

क्या ग्रामीण अपनी समस्या लेकर सीधे उससे मिल सकेंगे? क्या गांव की छोटी-बड़ी समस्याओं पर वह पंचायत स्तर पर आवाज उठाएगा? क्या चुनाव के बाद भी आम ग्रामीणों से उसी तरह संपर्क बनाए रखेगा, जैसा आज चुनाव के दौरान दिखाई दे रहा है?

ये सवाल किसी एक प्रत्याशी के लिए नहीं, बल्कि हर प्रत्याशी को परखने के लिए जरूरी हैं।

सरपंच का चुनाव सिर्फ एक दिन का नहीं, पांच साल का फैसला

सरपंच गांव का महत्वपूर्ण जनप्रतिनिधि होता है। इसलिए यह चुनाव केवल व्यक्तिगत पसंद या चुनावी माहौल देखकर निर्णय लेने का विषय नहीं होना चाहिए। मतदाता को अपने गांव की वर्तमान स्थिति और आने वाले पांच वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।

आज जो व्यक्ति आपके दरवाजे पर समर्थन मांगने आया है, कल वह आपके गांव की जिम्मेदारी संभाल सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कौन चुनाव जीत सकता है, बल्कि यह भी होना चाहिए कि कौन पांच साल तक गांव की जिम्मेदारी ईमानदारी और जवाबदेही के साथ निभा सकता है।

मतदाता खुद तय करें गांव का भविष्य

चुनावी वादे सुनना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता का है। हर मतदाता को प्रत्याशियों को समझने, उनके विचार जानने और गांव के हित में उनकी योजनाओं को परखने का पूरा अधिकार है।

इसलिए चुनाव के समय मिलने वाले आश्वासनों के साथ-साथ यह भी देखें कि प्रत्याशी जीतने के बाद जनता के सुख-दुख में कितना साथ खड़ा रहेगा।

क्योंकि सरपंच का चुनाव केवल एक प्रतिनिधि चुनने का चुनाव नहीं, बल्कि अगले पांच वर्षों के लिए गांव का नेतृत्व चुनने का फैसला है।