रिपोर्ट - बबलू वेद, झाड़ोल
झाड़ोल/फलासिया/ओगणा। पंचायतीराज चुनाव 2026 का कार्यक्रम सामने आते ही झाड़ोल, फलासिया और ओगणा क्षेत्र में चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है। तीनों पंचायत समितियों को पहले चरण में शामिल किए जाने से यहां पंचायत चुनाव का महासंग्राम अक्टूबर में ही निर्णायक दौर में पहुंच जाएगा। झाड़ोल की 34, फलासिया की 35 और ओगणा की 24 ग्राम पंचायतों समेत कुल 93 ग्राम पंचायतों में चुनावी प्रक्रिया एक साथ आगे बढ़ेगी। 23 अक्टूबर को पंचायत समिति एवं जिला परिषद सदस्यों के लिए मतदान होगा, जबकि 25 अक्टूबर को पंच और सरपंच पदों के लिए ग्रामीण अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।
राजस्थान में पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब गांव-गांव चुनावी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। प्रदेश में 14,403 सरपंच पदों के आरक्षण की लॉटरी निकाली गई है और महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान चुनावी गणित का बड़ा हिस्सा है।
23 अक्टूबर और 25 अक्टूबर—दो तारीखें, दो स्तरों पर होगा सत्ता का फैसला
झाड़ोल, फलासिया और ओगणा के मतदाताओं के लिए अक्टूबर की दो तारीखें सबसे महत्वपूर्ण रहेंगी। 23 अक्टूबर 2026 को पंचायत समिति एवं जिला परिषद सदस्यों के लिए मतदान होगा। इसके ठीक दो दिन बाद 25 अक्टूबर 2026 को ग्राम पंचायत स्तर पर पंच और सरपंच पद के लिए मतदान कराया जाएगा।
इस चुनावी कार्यक्रम की खासियत यह है कि मतदाता लगातार दो चुनावी दिनों में स्थानीय शासन के अलग-अलग स्तरों के प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। पहले पंचायत समिति और जिला परिषद के प्रतिनिधित्व का फैसला होगा और उसके बाद गांव की सीधे जुड़ी सरकार यानी पंच-सरपंच का चुनाव होगा।
मतदान सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक होगा। पंच-सरपंच चुनाव के बाद संबंधित ग्राम पंचायत मुख्यालय पर मतगणना की प्रक्रिया होगी और परिणाम सामने आएंगे।
आरक्षण ने सबसे ज्यादा बदला सरपंची का चुनावी गणित
इस बार चुनाव केवल पुराने चेहरों के इर्द-गिर्द नहीं घूमेगा। आरक्षण की लॉटरी ने कई संभावित दावेदारों के राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। जिस सीट पर वर्षों से किसी खास परिवार या सामाजिक समूह की दावेदारी मजबूत मानी जाती थी, आरक्षण बदलते ही वहां नए चेहरे सामने आ सकते हैं।
झाड़ोल, फलासिया और ओगणा में बड़ी संख्या में ग्राम पंचायत सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित होने के साथ महिला आरक्षण ने भी चुनावी तस्वीर बदल दी है। ऐसे में इस बार कई जगह पुरुष दावेदारों की जगह परिवार की महिला सदस्य को मैदान में उतारने की रणनीति देखने को मिल सकती है।
यही कारण है कि गांवों में अब सिर्फ यह चर्चा नहीं है कि कौन चुनाव लड़ेगा, बल्कि यह सवाल भी अहम हो गया है कि आरक्षण के हिसाब से कौन सा चेहरा सबसे मजबूत दावेदार बन सकता है।
तीनों पंचायत समितियों के प्रधान पद ST महिला के लिए आरक्षित
उपलब्ध आरक्षण विवरण के अनुसार झाड़ोल, फलासिया और ओगणा तीनों पंचायत समितियों के प्रधान पद अनुसूचित जनजाति महिला के लिए आरक्षित किए गए हैं।
इस आरक्षण का असर पंचायत समिति सदस्य चुनाव पर भी दिखाई देगा। प्रधान पद तक पहुंचने के लिए पंचायत समिति सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में केवल एक-एक वार्ड का चुनाव नहीं, बल्कि अलग-अलग वार्डों से जीतकर आने वाले सदस्यों के बीच बनने वाले राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होंगे।
यानी पंचायत समिति चुनाव में प्रत्याशी के साथ-साथ यह सवाल भी चुनावी रणनीति का हिस्सा रहेगा कि आने वाले समय में पंचायत समिति के नेतृत्व का समीकरण किस दिशा में जा सकता है।
झाड़ोल में 15 वार्ड, फलासिया में 15 और ओगणा में भी 15 वार्ड
तीनों पंचायत समितियों में पंचायत समिति सदस्य के लिए 15-15 वार्ड हैं। आरक्षण के कारण इन वार्डों में चुनावी दावेदारी का स्वरूप भी अलग-अलग है।
झाड़ोल में कई वार्ड ST ओपन और ST महिला श्रेणी में हैं, जबकि कुछ वार्ड अनारक्षित महिला और अनारक्षित ओपन श्रेणी में रखे गए हैं। फलासिया में भी अधिकांश वार्ड ST वर्ग की विभिन्न श्रेणियों में हैं। ओगणा में ST ओपन और ST महिला के साथ SC तथा अनारक्षित श्रेणी के वार्ड भी हैं।
इसका सीधा असर संभावित उम्मीदवारों पर पड़ेगा। कई पुराने दावेदारों को आरक्षण के कारण अपना वार्ड बदलना पड़ सकता है, वहीं कुछ नए चेहरों के लिए पहली बार चुनावी मैदान खुल सकता है।
परिसीमन के बाद बदला राजनीतिक भूगोल
आरक्षण के साथ परिसीमन ने भी चुनाव का पूरा भूगोल बदल दिया है। कई क्षेत्रों में वार्ड की सीमाएं और राजनीतिक समीकरण बदलने से पुराने प्रभाव क्षेत्र पहले जैसे नहीं रहे। कहीं नए गांव और क्षेत्र जुड़े हैं तो कहीं पुराने प्रभाव वाले इलाके अलग राजनीतिक समीकरण में चले गए हैं।
इसका मतलब यह है कि पिछले चुनाव का परिणाम इस बार के चुनाव का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता। उम्मीदवारों को बदले हुए क्षेत्र में नए मतदाताओं, नए गांवों और नए सामाजिक समीकरणों के बीच अपनी पकड़ साबित करनी होगी।
8 अक्टूबर से शुरू होगा असली चुनावी खेल
चुनावी कार्यक्रम के साथ अब राजनीतिक गतिविधियों को औपचारिक गति मिल जाएगी। 8 अक्टूबर से नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी। पंचायत समिति एवं जिला परिषद सदस्य पदों के लिए 13 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे। 14 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 15 अक्टूबर को नाम वापसी के बाद चुनावी मैदान की अंतिम तस्वीर सामने आएगी।
यही वह दौर होगा जब टिकट की दावेदारी, बागी उम्मीदवार, निर्दलीय चेहरे और स्थानीय स्तर पर बनने वाले गठजोड़ स्पष्ट होने लगेंगे।
ग्राम पंचायत स्तर पर भी 8 अक्टूबर से लोकसूचना जारी होने के साथ सरपंच और पंच पदों के दावेदार सक्रिय होंगे। इसके बाद गांव की चौपाल, घर-घर संपर्क, बैठकों और सामाजिक स्तर पर लामबंदी का दौर तेज होगा।
93 ग्राम पंचायतें, 242 मतदान बूथ—कितना बड़ा चुनावी नेटवर्क?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार झाड़ोल में 91, फलासिया में 94 और ओगणा में 57 मतदान बूथ दर्ज हैं। यानी तीनों पंचायत समितियों में कुल 242 मतदान बूथ चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे।
ग्राम पंचायतों की संख्या के लिहाज से फलासिया 35 पंचायतों के साथ आगे है। इसके बाद झाड़ोल में 34 और ओगणा में 24 ग्राम पंचायतें हैं। इस तरह तीनों क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियां अलग होने के बावजूद चुनावी प्रक्रिया एक ही चरण में संचालित होगी।
यही वजह है कि प्रशासनिक स्तर पर भी 23 और 25 अक्टूबर की तारीखें महत्वपूर्ण रहेंगी।
असली मुकाबला सिर्फ सरपंची का नहीं
इस चुनाव को केवल सरपंच चुनाव मानना बड़ी तस्वीर को छोटा कर देना होगा। एक तरफ पंच और सरपंच गांव की सरकार का चेहरा तय करेंगे, वहीं दूसरी तरफ पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य अगले स्तर के ग्रामीण राजनीतिक नेतृत्व की नींव रखेंगे।
पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव के बाद प्रधान पद के लिए राजनीतिक समीकरण बनेंगे। तीनों पंचायत समितियों में प्रधान पद ST महिला आरक्षित होने के कारण पंचायत समिति चुनाव में महिला नेतृत्व का सवाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेगा।
प्रदेश स्तर पर भी पंचायत समिति प्रधानों के आरक्षण में महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी तय हुई है; 457 पंचायत समितियों में 221 प्रधान पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं।
गांव की चौपाल पर अब विकास बनाम वादों की परीक्षा
चुनावी हलचल बढ़ने के साथ मतदाताओं के सामने स्थानीय मुद्दे भी केंद्र में आएंगे। सड़क, पेयजल, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, रोजगार, आवागमन और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे मुद्दे गांवों में प्रत्याशियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
पिछले पांच वर्षों में किस पंचायत में क्या काम हुआ, कहां काम अधूरा है, किन गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है और कौन प्रत्याशी इन समस्याओं को पंचायत स्तर पर उठाने में सक्षम होगा—इन सवालों पर ग्रामीण चर्चा तेज होना स्वाभाविक है।
आरक्षण ने उम्मीदवार तय करने की पहली शर्त भले ही तय कर दी हो, लेकिन उसके बाद मतदाता अपने स्थानीय अनुभव और मुद्दों के आधार पर उम्मीदवारों का आकलन करेंगे।
20 नवंबर को खुलेगा पंचायत समिति की सत्ता का बड़ा गणित
23 अक्टूबर को पंचायत समिति एवं जिला परिषद सदस्य पदों के लिए मतदान के बाद इन पदों की मतगणना 20 नवंबर 2026 को निर्धारित है। इसके बाद प्रधान और उपप्रधान के चुनाव की प्रक्रिया नवंबर में होगी।
इसलिए 23 अक्टूबर को वोट पड़ने के बाद भी पंचायत समिति की सत्ता का पूरा राजनीतिक गणित उसी दिन सामने नहीं आएगा। असली तस्वीर मतगणना के बाद स्पष्ट होगी और उसके बाद प्रधान पद के लिए सदस्यों के बीच बनने वाले समीकरण महत्वपूर्ण होंगे।
अब गांव-गांव में एक ही चर्चा—कौन संभालेगा अगले पांच साल की कमान?
झाड़ोल, फलासिया और ओगणा में चुनावी बिसात अब तैयार हो चुकी है। 93 ग्राम पंचायतें, 15-15 पंचायत समिति वार्ड, बदला हुआ परिसीमन, नई आरक्षण व्यवस्था और पहले चरण में मतदान—इन सभी ने चुनाव को बहुस्तरीय बना दिया है।
8 अक्टूबर से नामांकन शुरू होने के बाद चुनावी तस्वीर और साफ होगी। 15 अक्टूबर के बाद प्रत्याशियों के अंतिम चेहरे सामने आएंगे। 23 अक्टूबर को पंचायत समिति एवं जिला परिषद के लिए मतदाता फैसला करेंगे और 25 अक्टूबर को गांव की सरकार के पंच-सरपंच चुनेंगे।
लेकिन इस पूरे चुनाव की सबसे बड़ी कहानी यही होगी कि आरक्षण ने जहां उम्मीदवारों का गणित बदला है, वहीं मतदाता अब विकास, स्थानीय पकड़, जनता से जुड़ाव और पांच साल की जवाबदेही के आधार पर अपना फैसला तय करने की स्थिति में होंगे।
झाड़ोल, फलासिया और ओगणा में अब चुनाव सिर्फ कुर्सी का मुकाबला नहीं, बल्कि अगले पांच वर्षों के ग्रामीण नेतृत्व की तस्वीर तय करने की प्रक्रिया बन चुका है। अक्टूबर में मतदान होगा, नवंबर में पंचायत समिति की सत्ता का गणित खुलेगा और इसके साथ यह भी सामने आएगा कि बदले हुए आरक्षण और परिसीमन के बीच किस तरह का नया स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व उभरता है।
